रोज घर से निकलता हूँ।
नौकरी पर जाता हूँ।
घर आता हूँ।
घर का कोई अधूरा काम होता है तो उसे पूरा करता हूँ।
कभी बहुत थका होता हूँ तो खुद से कह देता हूँ—
“कल कर लूँगा।”
थोड़ी बातें अपनी पत्नी से करता हूँ।
खाना खाता हूँ।
सो जाता हूँ।
फिर वही कल।
घर से निकलना।
नौकरी पर जाना।
घर वापस आना।
कभी-कभी लगता है जैसे किसी टाइमलूप ने बाँध रखा है।
हाल ही में मैंने अपनी माँ को खोया।
कुछ दिनों के लिए लगा था कि शायद अब जिंदगी पहले जैसी नहीं होगी।
शायद समय रुक जाएगा।
शायद उनके जाने का दर्द हर चीज को बदल देगा।
लेकिन फिर छुट्टियाँ खत्म हो गईं।
नौकरी पर जाना शुरू हो गया।
घर आना शुरू हो गया।
काम फिर से शुरू हो गया।
जिंदगी चलती रही।
और कभी-कभी मन में एक अजीब सा सवाल आता है—
जिस इंसान ने अपनी पूरी जिंदगी हमें बनाने में लगा दी, क्या उसके लिए हमारे पास रोने तक का समय नहीं है?
या शायद समय है…
बस जिंदगी हमें रुकने नहीं देती।
कभी किसी ऐसे इंसान से मिलता हूँ जिसे मेरे नुकसान के बारे में पता है।
वो पूछता है—
“सब ठीक है?”
मैं मुस्कुराकर कहता हूँ—
“हाँ, सब ठीक है।”
फिर वो शायद मेरी आँखों में कुछ पढ़ने की कोशिश करता है।
मैं मुस्कुराता हूँ।
और बात बदल देता हूँ।
लेकिन उसके जाने के बाद वही सवाल मेरे अंदर रह जाता है—
क्या वाकई सब ठीक है?
शायद नहीं।
लेकिन फिर सोचता हूँ…
किससे कहूँ?
कैसे कहूँ?
अगर किसी के सामने बैठकर अपने मन की बात कहूँ तो क्या वो सोचेगा कि मुझे sympathy चाहिए?
या वो ये समझेगा कि मुझे कोई solution चाहिए?
जबकि शायद मुझे इनमें से कुछ भी नहीं चाहिए।
शायद मुझे बस…
किसी के साथ बैठकर कुछ देर बात करनी है।
लेकिन क्या आज किसी के पास इतना समय है कि वो आपके लिए कुछ देर रुक सके?
शायद हाँ।
शायद नहीं।
मेरी पत्नी है।
मुझे शायद उससे ये सब बातें करनी चाहिए।
लेकिन फिर एक और सवाल मन में आता है—
अगर मैं उसे बताऊँ कि मैं अंदर से दुखी हूँ, तो कहीं वो ये न सोचने लगे कि वो मुझे खुश नहीं रख पा रही।
जबकि सच ये है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
मेरे दुख का उससे कोई लेना-देना नहीं।
वो मेरे साथ है।
बस कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें कोई दूसरा इंसान दूर नहीं कर सकता।
उन्हें बस…
सुना जा सकता है।
और शायद यही बात हम भूल गए हैं।
हम हर दुख का solution ढूँढने लगे हैं।
किसी को financial loss हुआ है।
किसी ने अपना कोई अपना खोया है।
किसी को किसी के न मिल पाने का दर्द है।
किसी के सपने अधूरे रह गए हैं।
किसी के रिश्ते में सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी है।
हर किसी के पास अपनी एक कहानी है।
लेकिन शायद सबसे बड़ी समस्या ये नहीं है कि लोग दुखी हैं।
शायद समस्या ये है कि—
लोगों के पास अपने दुख के बारे में बात करने का समय नहीं है।
हम पूछते हैं—
“सब ठीक है?”
और सामने वाला कह देता है—
“हाँ, सब ठीक है।”
हम भी आगे बढ़ जाते हैं।
क्योंकि हमारे पास भी काम है।
घर जाना है।
बच्चों को देखना है।
बिल भरना है।
कल सुबह जल्दी उठना है।
और जिंदगी…
चलती रहती है।
लेकिन कभी-कभी सोचता हूँ—
अगर हम किसी से सिर्फ इतना पूछें कि,
“सच बताना… सब ठीक है?”
और उसके बाद थोड़ी देर चुप रह जाएँ…
शायद वो पहली बार कह पाए—
“नहीं।”
और शायद उसे किसी सलाह की जरूरत भी न हो।
शायद उसे बस इतना चाहिए हो कि कोई उसके पास बैठा रहे।
बिना उसे ठीक किए।
बिना उसे समझाए।
बिना ये कहे कि—
“समय सब ठीक कर देगा।”
बस…
कुछ देर उसके साथ रहे।
क्योंकि शायद हम सबके अंदर कुछ ऐसा है—
जो हम कहना चाहते हैं,
लेकिन कहते नहीं।
और शायद इसी का नाम है—
Unsaid Things

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